

चितरंगी/ सिंगरौली- चितरंगी तहसील से एक बेहद चौंकाने वाला और न्याय की गुहार लगाता मामला सामने आया है, जहाँ 25 वर्ष पहले खरीदी गई ज़मीन को मृत विक्रेता के वारिस अब हड़पने की कोशिश कर रहे हैं। यह मामला न्याय, प्रशासन और सिस्टम की संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
पूरा मामला विश्वनाथ साकेत, से जुड़ा है जो कि आर्थिक रूप से बेहद कमजोर और असहाय हैं, दिनांक 8 जुलाई 2001 को ग्राम बरा, ग्राम पंचायत लोंहदा निवासी बिंदेश्वरी पाल से 7500 रुपये में 1 एकड़ भूमि खरीदी थी। यह सौदा गांव के चार प्रमुख व्यक्तियों की उपस्थिति में तय हुआ था और पाँच गवाहों के हस्ताक्षर भी बिक्री पत्र पर मौजूद हैं।
बिक्री पत्र के अनुसार, 4700 रुपये तत्काल विक्रेता को दिए गए और 2800 रुपये रजिस्ट्री के दिन देने की बात तय हुई थी। विश्वनाथ साकेत ने न केवल इस भूमि पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनाया, बल्कि बीते 25 वर्षों से इस भूमि पर काबिज भी रहे हैं।
रजिस्ट्री क्यों नहीं हुई?
सन 2003 में बिंदेश्वरी पाल का निधन हो गया। इसके बाद विश्वनाथ साकेत लगातार उनके वारिसों से रजिस्ट्री की मांग करते रहे, परंतु उन्हें केवल टालमटोल और आश्वासन ही मिलते रहे। इसी बीच मध्यप्रदेश शासन द्वारा अभयारण क्षेत्र में रजिस्ट्री प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई, जिससे मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
अब हाल ही में जैसे ही भूमि के बटनवारा का काम शुरू हुआ, बिंदेश्वरी पाल के वारिसों ने मौके का फायदा उठाते हुए शेष बची ज़मीन पर जबरन कब्जा कर लिया। प्रधानमंत्री आवास तो अभी भी विश्वनाथ साकेत के कब्जे में है, परंतु अन्य हिस्से पर कब्जे की कोशिशें की जा रही हैं।
न्याय के लिए दौड़
विश्वनाथ साकेत ने इस संबंध में थाना गढ़वा में शिकायत की है और दिनांक 26 जुलाई 2025 को जनसुनवाई में एसडीएम के समक्ष अपनी पूरी व्यथा रखी। एसडीएम द्वारा उन्हें कोर्ट में जाने की सलाह दी गई, परंतु विश्वनाथ जैसे गरीब, अनपढ़ और कानूनी प्रक्रिया से अनजान व्यक्ति के लिए यह रास्ता बेहद कठिन है।
अब विश्वनाथ साकेत ने मीडिया और प्रशासन से न्याय की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि वे केवल अपना हक मांग रहे हैं, जिस जमीन के लिए उन्होंने मेहनत की कमाई लगाई, वर्षों से उस पर निवास कर रहे हैं, उसी को अब उनसे छीना जा रहा है।
समाज और प्रशासन से सवाल क्या एक गरीब व्यक्ति को न्याय पाने के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने होंगे?
क्या गवाहों और लिखित बिक्री पत्र की कोई कानूनी हैसियत नहीं?
25 वर्षों से काबिज व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं बनता? यह मामला प्रशासन और शासन के लिए एक चेतावनी है कि गरीबों की आवाज़ को अनसुना करना उन्हें अन्याय की अंधेरी गुफाओं में धकेलना है। समय रहते अगर विश्वनाथ साकेत जैसे नागरिकों को न्याय नहीं मिला, तो यह विश्वास की बुनियाद को कमजोर करेगा।
हमारी प्रशासन से मांग है कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कर, गरीब व्यक्ति को न्याय दिलाया जाए और भूमि विवाद का शीघ्र समाधान किया जाए।